Our Blog

Gramvaani has a rich history of developing mixed media content that includes audio-video stories, developing reports based on surveys conducted with population cut off from mainstream media channels and publishing research papers that helps in changing the way policies are designed for various schemes. Our blog section is curation of those different types of content.

भूखे पेट, खाली खाता, सूनी थाली! मिड डे मील का राशन और पैसा बना ‘आपदा में अवसर”

admin 28 May 2021

इंसान को जीने के लिए जो सबसे बुनियादी चीजें चाहिए उनमें से एक है भोजन. अच्छा पेटभर भोजन मिले तो बच्चा स्वस्थ रहे. तंदुस्ती के साथ आगे बढ़े, दिमागी रूप से सक्षम बनें और देश की प्रगति में योगदान दे. 15 अगस्त 1995 को जब लाल किले में तिरंगे के नीचे खड़े होकर स्कूलों में मध्यान भोजन यानि मिड डे मील योजना दिए जाने की घोषणा की गई थी तो पहली लाइन में लिखी गई सारी बातें हकीकत होती नजर आईं थीं. स्कूल में भोजन मिले, बच्चों के लिए इससे अच्छा क्या हो सकता था.

थाली तक नहीं पहुंचे अनाज के दाने

अलग अलग राज्यों की सर्कार ने मध्यं भिजन के लिए अलग अलग व्यवस्थाएं की हैं कहीं सुखा राशन तो कहीं नकद राशी की व्यवस्था की गयी.  सरकार दावा कर रही है कि हमने तो बहुत पहले ही पके हुए मध्यान भोजन  या फिर उसके बदले की राशि बच्चों के खाते में डाल दी है. पर 24 अगस्त को जब बिहार राज्य के जमुई जिला गिद्धौर प्रखंड में संवाददाता ने गांव की महिला से बात की तो उसने बताया कि जब से लॉकडाउन लगा है तब से आज तक स्कूल में बच्चों को भोजन नहीं मिला. उनके 3 बच्चे माध्यमिक स्कूल में पढ़ते हैं. मार्च से अब तक स्कूल बंद हैं इसलिए माध्यानं भोजन मिलना भी बंद है. गांव में पहले ही काम नहीं मिल रहा है तो सोचा बच्चों को ही खाने के लिए कुछ मिल जाए पर ये भी नहीं हो सका. अब 3 बच्चे भी अपने माता—पिता के साथ किसी तरह एक वक्त आधे पेट भोजन करके गुजारा कर रहे हैं.

गिद्धौर के रतनपुर पंचायत, खरगटिया, बानाडीह, कैराकादो कई गांव है जहां के स्कूलों में मध्यानं भोजन के नाम पर छात्रों के साथ छलावा हुआ है. कुछ जगहों पर जहां भोजना बांटें जाने की बात कही जा रही है वहां के बच्चों को ये ही नहीं पता कि उन्हें कितना चावल या अनाज दिया गया है. छात्रों को 100 से 150 ग्राम चावल या गेंहूं महीने के कुल स्कूल खुलने के दिन को गिन कर दिया जाना था जो तक़रीबन 20-22 दिन होते हैं अगर कुछ खास छुट्टियाँ नहीं हुयी हों तो प्रति दिन के हिसाब से दिया जाना था पर इस थोड़े से अनाज की तौल में भी घपलेबाजी हुई.

असल में हकीकत यही है, बिहार के 8 जिले तो ऐसे हैं जहां पिछले सप्ताह तक 92% तक बच्चों को राशन नहीं दिया गया था. यह सर्वे एक मीडिया संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में किया है. राज्य में मिड डे मील से महरूम हुए बच्चों की असल स्थिति समझनी है तो जरा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का एक ट्वीट पढ़ें. आयोग ने बिहार में कोरोना वायरस के कारण बंद हुए स्कूलों के बच्चों को मिड-डे मील का लाभ नहीं देने की खबरों पर गहरी नाराजगी जाहिर की है. आयोग ने कहा कि इस योजना का लाभ नहीं मिलने के कारण पेट भरने के लिए बच्चों को कबाड़ बीनने और भीख मांगने के लिए मजबूर होना पड़ा है. इस मामले में बिहार सरकार को बिहार सरकार को नोटिस भी जारी किया गया.

भूखे पेट ना सोते हैं ना रोते हैं!

उन परिवारों में जहां माता—पिता के पास रोजगार नहीं है और बच्चों की थाली रोटी का इंतजार कर रही है, वहां के बच्चों की तो यही कहानी है. भूखे पेट नींद कैसे आए और इतनी ताकत भी नहीं कि रो सके. रांची जिला के ओरमांझी प्रखंड से शांति देवी ने बताया कि मिड डे मील नहीं मिलने से बच्चे भूखे हैं. उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद जखनियां ब्लॉक के स्कूलों में भी भोजन नहीं बांटा गया है. ब्लॉक की अनीता देवी कहती हैं कि मेरे परिवार के 5 बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे, वहां खाना मिल जाता था तो कम से कम हमें चिंता नहीं थी पर अब तो समझ नहीं आता कि अपना पेट भरे कि बच्चों का? स्कूल वाले बोलते हैं कि आधार कार्ड नहीं होगा तो खाना नहीं मिलेगा, खाने के बदले पैसे भी नहीं मिलेंगे. यह कहते हुए अनीता रो देती हैं. सिसकियां भरते हुए अनीता कहती हैं कि हम गरीबों के तो कोई अरमान ही नहीं है, बस बच्चों को दो वक्त का खाना मिल जाए इतना ही बहुत है.

मप्र के शिवपुरी से राम बताते हैं कि उनकी बहन को सरकारी स्कूल में शिक्षा के साथ भोजन मिल जाता था पर लॉकडाउन के बाद से सब बंद है. सरकार ने सूखा अनाज देने के लिए कहा था पर स्कूल वालों ने तो वो तक नहीं दिया. ना हमारे खाते में पैसे आए हैं. गाजीपुर के दंडापुर से कमलेश कुमार बताते हैं कि सरकार ने कोरोना काल में मध्यानं भोजन के बदले छात्रों के खाते में 1 हजार रुपए जमा करने की बात कही थी पर 4 महीने से ना तो राशन मिला ना उसके बदले की राशि. एक सर्वे के अनुसार करीब 20% बच्चों को न तो मिड-डे मील का खाद्यान्न मिला है और न ही इसके लिए दी जाने वाली राशि. जिसके कारण राज्य के करीब 36 लाख बच्चे प्रभावित हो रहे हैं. गाजीपुर के ही जखनियां क्षेत्र के रेवरिया गांव से लक्ष्मण कुमार कहते हैं कि स्कूल के शिक्षकों ने कहा था कि प्रायमरी के शिक्षक मध्यानं भोजन की राशि देने आएंगे पर कोई आया नहीं, और राशन भी नहीं मिला.

दा वायर की एक रिपोर्ट बताती है कि मध्यानं भोजन के नाम पर बंगाल में बच्चों को सिर्फ़ चावल और आलू दिया गया वो भी तय मात्रा से काफी कम. यहां तक कि पश्चिम बंगाल में अप्रैल महीने में 2.92 लाख और मई महीने में 5.35 लाख बच्चों को मिड-डे मील योजना का कोई लाभ नहीं मिला है. एमएचआरडी द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 12 जिलों में योजना के तहत आवंटित खाद्यान्न की तुलना में काफी कम उपयोग हुआ है. इसके अलावा उत्तराखंड राज्य ने अप्रैल और मई महीने में लगभग 1.38 लाख बच्चों को मिड-डे मील मुहैया नहीं कराया है, जबकि त्रिपुरा की भाजपा सरकार ने मिड-डे मील के एवज में छात्रों के खाते में कुछ राशि ट्रांसफर करने का आदेश दिया था, जो कि सिर्फ खाना पकाने के लिए निर्धारित राशि से भी कम है.

भारत सरकार के मानक के अनुसार मिड-डे मील योजना के तहत प्राथमिक स्तर पर 100 ग्राम एवं उच्च प्राथमिक स्तर पर 150 ग्राम खाद्यान्न प्रति छात्र प्रतिदिन के हिसाब से उपलब्ध कराया जाना चाहिए. यानी कि महीने के कुल स्कूल खुलने के दिनों को गिनकर प्रति  दिन के हिसाब से प्राथमिक स्तर के छात्र को तीन किलो और उच्च प्राथमिक स्तर के छात्र को 4.5 किलो खाद्यान्न दिया जाना चाहिए. इसके अलावा एक अप्रैल 2020 से लागू किए गए नए नियमों के मुताबिक सिर्फ खाना पकाने के लिए प्राथमिक स्तर पर 4.97 रुपये और उच्च स्तर पर 7.45 रुपये की धनराशि प्रति छात्र प्रतिदिन उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिसमें दाल, सब्जी, तेल, नमक ईंधन आदि का मूल्य शामिल हैं.

इसका मतलब ये है कि महीने  हिसाब से ‘खाना पकाने के लिए’ प्राथमिक स्तर के प्रति छात्र को 149.10 रुपये और उच्च प्राथमिक स्तर के छात्र को 223.50 रुपये दिए जाने चाहिए. यदि खाना पकाने की राशि नहीं दी जाती है तो प्राथमिक स्तर के प्रति छात्र को प्रतिदिन 20 ग्राम दाल, 50 ग्राम सब्जियां, पांच ग्राम तेल एवं वसा और जरूरत के मुताबिक नमक और मसाले दिए जाने चाहिए. वहीं उच्च प्राथमिक के छात्र को प्रतिदिन 30 ग्राम दाल, 75 ग्राम सब्जियां, 7.5 ग्राम तेल एवं वसा और जरूरत के अनुसार नमक एवं मसाले देना होता है. पर ये सब सिर्फ कागजों में हुआ.

बाढ़, कोरोना और खाना

एक सर्वे के अनुसार बिहार में लगभग 1.19 करोड़ बच्चों को 4 मई से 31 जुलाई तक 80 दिनों की मिड-डे मील राशि नहीं मिली है. विभिन्न जिलों में लगभग 70 लाख बच्चों को ही इस अवधि का खाद्यान्न मिला है. एमडीएम निदेशक कुमार रामानुज ने भी माना है कि उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित 16 जिलों में खाद्यान्न वितरण प्रभावित रहा है. वहीं, 8 जिलों में तो केवल 8% तक बच्चों को ही राशन दिया गया था. जल्दबाजी में इन जिलों के जिम्मेदारों को नोटिस भी दिया गया है. बच्चों को 31 अगस्त तक मिड-डे मील की राशि दे दी जाएगी. पर पूरा अगस्त का महीना बीत गया और बच्चों के खाते और थाली दोनों खाली हैं.

मप्र के शिवपुरी से कक्षा 7 की एक छात्रा बताती है कि स्कूल जाते थे तो कम से कम एक वक्त पेट भर खाना खाते थे अब तो वो भी नहीं मिलता. मोबाइलवाणी पर कक्षा 7 के हृदयेश लोधी सरकार से खाने की मांग कर रहे हैं. सुनने में ही कितना बुरा लगता है जब एक छोटा सा बच्चा सरकार से कहे कि उसे कुछ खाने को दिया जाए, भूख लगी है! इस स्थिति में विकलांग बच्चों की स्थिति तो और भी खराब है. शिवपुरी के माध्यमिक शाला के छात्र रंजीत वंशकार बोलने में अक्षम है, वह सरकार से लिख कर गुजारिश कर रहे हैं कि उन्हें आवाज नहीं दे सकते तो कम से कम भोजन तो दे दो. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि ऐसे समय में इस तरह की योजनाओं को बंद नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि यह बच्चों के पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है. पर इसकी चिंता है किसे?

सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि ऐसे समय में इस तरह की योजनाओं को बंद नहीं रखा जा सकता है क्योंकि यह बच्चों के पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत है, पर इसकी चिंता है किसे?

भारत में डिजास्टर मैनजेमेंट एक्ट और एपिडेमिक एक्ट जैसे कानून हैं। जो आपदा से बचाव के लिए बिना किसी भेदभाव के निष्पक्ष तरीके से सभी लोगों पर लागू होते हैं। साथ में कार्यकालिका को बड़े स्तर पर पावर देते हैं कि आपदा से लड़ने के लिए कुछ भी करे। लेकिन क्या कानून को लागू करवा देना ही सबकुछ होता है। यह भी कानून का जरूरी हिस्सा होता है कि कानून का प्रभाव अलग अलग जाती ,समुदाय,वर्ग पर क्या पड़ रहा है?

समानता की सिद्धांत और संविधान सभा के अनेकों बहसों के बाद यह बात भी मान ली गयी थी कि ऐसा कानून नहीं बनाया जाएगा जो सब पर बिना किसी भेदभाव के लागू होने के बावजूद भी असर ऐसा डालता हो जिसमें बहुत बड़े समुदाय पर भेदभाव साफ-साफ़ दिखता हो। जैसे कोरोना के मामले में दिख रहा है। कुछ मुठ्ठी भर लोगों के सिवाय भारत का बहुत बड़ा समूह वर्क फ्रॉम होम नहीं कर सकता है। करोड़ों लोगों का आजीविका ने साथ छोड़ दिया है और ओ संविधान की धरा 21 का खुले तौर पर उलंघन है.

संविधान के अनुच्छेद 14 की भाषा समझिये। अनुच्छेद 14 कहता है कि ‘भारत के राज्य में किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा ‘ विधियों के समान संरक्षण का मतलब है कि ऐसा कानून नहीं लागू हो जिससे सब पर अलग-अलग प्रभाव पड़े।

समानता के अधिकार वाले अनुच्छेदों में इसके कुछ अपवाद भी हैं। लेकिन अपवाद का मकसद यह है कि ऐसा भेदभाव किया जाए जिसका असर समान हो। लेकिन लॉकडाउन का असर सब पर बराबर नहीं है। यहाँ पर साफ़ तौर पर क्लास का अंतर दिख जा रहा है। अमीर इससे निपट ले रहे हैं लेकिन गरीबों को परेशानी हो रही हो। यानी लॉकडाउन का असर भेदभाव से भरा हुआ है।  संविधान का अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अधिकार का मतलब नहीं है कि लोगों को जानवरों की  तरह समझा जाए। जैसे कोरोना वायरस की लड़ाई में देखने को मिल रहा है झुंड में इकठ्ठा कर प्रवासी मजदूरों पर केमिकल का छिड़काव कर दिया गया। क्वारंटाइन के नाम पर स्कूलों में लोगों को जानवरों की तरह ठूंस कर रखा

आपदा में कालाबाजारी के अवसर

इन दौर में जबकि सबको एक दूसरे की मदद करना चाहिए थी तो यहां भी कालाबाजारी शुरू कर दी. बिहार के मुजफ्फरपुर के मोतीपुर से मोबाइलवाणी पर ग्रामीणों ने बताया कि मध्यान भोजन के लिए एसएफसी गोदाम से मिलने वाला अनाज की काला बाजारी हो रही है. जब अनाज से भरा ट्रक प्राथमिक विद्यालय लखनसेन पहुंचा तो ग्रामीणों ने उसे घेर लिया. बाद में देखा तो स्कूल के अनाज के 4 बोरे यानि करीब डेढ क्विंटल अनाज ट्रक पर मिला. ये अनाज बाजार में बिकने के लिए जा रहा था. मधुबनी में भी मिड डे मील का अनाज नहीं दिए जाने पर डीईओ नसीम अहमद और डीपीओ मो. इम्तियाज को शोकॉज नोटिस जारी किया गया है. उनकी लापरवाही के कारण करीब 5 लाख बच्चे इतने महीने से मिड डे मील से वंचित हैं.

झारखंड के हजारीबाग से बसंती देवी बताती हैं कि मिड डे मील मिल रहा था तो बच्चे की सेहत ठीक थी पर अब जब से खाना मिलना बंद हुआ है वो बहुत कमजोर हो गया है. हम लोगों के  पास भी इतने पैसे नहीं है कि उसकी पूर्ति कर सकें. बोकारो के जिरीडीह से मुक्ता देवी ने बताया कि छोटे बच्चों को आंगनबाड़ी से खाना मिलना भी बंद हो गया है. दो तीन महीने में थोड़ा बहुत अनाज मिल जाता है उसी से गुजारा करते हैं. सोनपुर प्रखंड के भरपूरा पंचायत के भरपरा उत्क्रमित मध्य विद्यालय के शिक्षक मदन कुमार कहते हैं बच्चों को सूखा चावल बांट रहे हैं. अब भले ही इससे पोषक तत्वों की पूर्ति ना हो पर हमारे पास कोई और चारा नहीं. सरकार से तो यही मिल रहा है.

शिवपुरी से एक व्यक्ति ने बताया कि उनकी बेटी कक्षा 7 में पढ़ती है. हमारी तो कोई खास कमाई है नहीं, जो थी वो लॉकडाउन के बाद से खत्म ही हो गई. अब बेटी को अच्छा भोजन नहीं करवा पा रहे हैं. वो पहले से ज्यादा कमजोर हो गई है. बिहार के समस्तीपुर के सिंघिया प्रखंड के सरकारी स्कूल के शिक्षक रणविजय प्रसाद कहते हैं सरकार चावल—आलू बांटकर समझ रही है कि उसकी जिम्मेदारी पूरी हो गई पर इतने से होता क्या है? बच्चे मानसिक और शरीरिक रूप से कमजोर हो रहे हैं. ना तो राशन समय पर मिल रहा है ना उनके खाते में पर्याप्त पैसे आ रहे हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बिहार राज्य के भागलपुर जिले के स्कूली बच्चे भीख मांगने से लेकर कूड़ा बीनने जैसे काम कर अपने लिए खाना जुटा रहे हैं. ये मामला जिले के बडबिला गांव के मुसहरी टोला का है. जरा सोचिए की स्थिति कहां तक पहुंच गई है. हम केवल बिहार को ही क्यों देखें, झारखंड, मध्यप्रदेश, पूर्वोत्तर राज्य और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में भी तो बच्चे इसी स्थिति में हैं!

https://rootlocalhost.net/ slot demo ikn4d iboplay bandar bola iboplay roda777 slot pulsa https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/187 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/188 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/189 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/190 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/191 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/192 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/193 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/215 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/216 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/217 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/218 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/219 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/220 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/221 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/255 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/256 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/257 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/258 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/259 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/260 https://journal.binus.ac.id/index.php/SEEIJ/libraryFiles/downloadPublic/261 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/296 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/297 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/298 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/299 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/300 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/301 https://journal.universitassuryadarma.ac.id/index.php/jti/libraryFiles/downloadPublic/302