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गरीबों के राशन से किसका पेट भर रही है सरकार?

जी हां.. सवाल बिल्कुल सीधा है? क्योंकि गरीबों को तो राशन नहीं मिल रहा है, अगर उन्हें नहीं मिल रहा है तो फिर जा कहां रहा है? क्योंकि केन्द्र सरकार और या राज्य सरकार वे दावे करने से नहीं चूक रही हैं. दावे ये हैं कि गरीबों की थाली दाल चावल और रोटी से भरी है. अगर ये सच है तो भूख से बिलबिलाकर आत्महत्या करने के मामले झूठे हैं! एक सर्वे के हिसाब से लॉकडाउन के दौरान देश में करीब 4500 लोगों ने भूख से परेशान होकर आत्महत्या की हैं. बेरोजगारी और आर्थिक नुकसान से होने वाली आत्महत्याओं से अलग. ये वो संख्या है जो दर्ज हुई पर उन मौतों का क्या जो कागजों तक पहुंची ही नहीं? 

खैर इस सवाल को पूछने से पहले मोबाइलवाणी ने जमीन हकीकत जानने की कोशिश की और इस कोशिश का को नाम दिया रोजी रोटी अधिकार अभियान. अभियान के तहत बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के गांव और शहरों में गरीब तबके के परिवारों से उनका हाल जाना. हमें जो पता चला वह उस सरकारी तस्वीर से बिल्कुल अलग है जो दुनिया को दिखाई जा रही है. 

आंकड़े सब बोल देते हैं

बिहार की भू​तपुरा पंचायत के मुखिया अनिल कुमार गुप्ता कहते हैं कि गांव में प्रवासी मजदूर वापिस आए हैं. पहली चुनौती तो उनको काम मुहैया करवाने की है और दूसरी गरीबों को राशन देने की. सरकार भले ही दावा करते रहे पर हमारे गांव में तो ना गरीबो के राशन कार्ड बन पा रहे हैं ना ही जॉब कार्ड. गरीबों को राशन मिलना था पर ऐसा हुआ नहीं. हमने डीलरों से बात करके कुछ लोगों को खाद्य सामग्री मुहैया करवाई है पर ये काफी नहीं है. हमने एमओ और एसडीओ को इस बारे में बताया गया है लेकिन हमें वहां से आश्वासन तक नहीं मिला. अब आप ही बताओ हम क्या करें? गांव वालों को तो हम से ही उम्मीद है और हमें सरकार से. सोचिए ये हकीकत एक गांव का मुखिया बयां कर रहा है. 

इस साल मार्च में केंद्र सरकार ने कोरोनावायरस लॉकडाउन के दौरान सार्वजनिक वितरण व्यवस्था या पीडीएस के जरिए निशुल्क राशन वितरण करने के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए थे. इस घोषणा के बाद बिहार राज्य सरकार ने अप्रैल में एक करोड़ राशन कार्ड धारकों को पांच किलो चावल और एक किलो दाल निशुल्क देने की घोषणा की. लेकिन राज्य में अनाज का वितरण प्रभावकारी नहीं है और यहां खाद्य संकट ने स्वास्थ्य संकट को गहरा कर दिया है.

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के आधार पर सरकार ने घोषणा की थी कि मई और जून महीने के लिए कुल आठ करोड़ ऐसे प्रवासी मजदूरों, फंसे हुए लोगों और जरूरतमंदों को भी मुफ्त राशन दिया जाएगा, जिनके पास राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) या राज्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत राशन कार्ड नहीं है. नौ जुलाई को उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने एक प्रेस रिलीज जारी की. जिसके मुताबिक मई महीने में सिर्फ 2.24 करोड़ और जून महीने में सिर्फ 2.25 करोड़ प्रवासी मजदूरों को ही खाद्यान्न मुहैया कराया है. ये संख्या सरकार द्वारा निर्धारित कुल आठ करोड़ लाभार्थियों की तुलना में मात्र 28 फीसदी और 28.12 फीसदी है. 

इसके अलावा योजना के तहत कुल आठ लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न का आवंटन हुआ है. लेकिन इसमें से राज्यों ने अभी तक 6.39 लाख टन ही खाद्यान्न्न उठाया है. इसमें से 2.32 लाख टन अनाज का ही अभी तक वितरण हुआ है. इसका मतलब है कुल आवंटन की तुलना में सिर्फ 29 फीसदी अनाज का ही वितरण हो पाया है. कम वितरण के कारण अब केंद्र सरकार ने आत्म निर्भर भारत पैकेज के तहत प्रवासी मजदूरों को राशन देने की समयसीमा को बढ़ाकर 31 अगस्त 2020 तक कर दी है. तर्क ये दिया जा रहा है कि केंद्र सरकार ने कहा कि योजना के तहत पात्र लाभार्थियों की पहचान न हो पाने के कारण राशन वितरण में देरी हो रही है.

वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत भी अप्रैल से लेकर जून तक सभी लाभार्थियों को खाद्यान्न नहीं मिला है. केन्द्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इस योजना के तहत जून में 64.42 करोड़ लोगों को ही खाद्यान्न मिला है, जबकि योजना के तहत कुल 80 करोड़ लाभार्थी हैं. यानि जून महीने में कम से कम 15.58 करोड़ लोगों को इस योजना के तहत अतिरिक्त खाद्यान्न नहीं मिला है. इसके अलावा जून महीने में कुल 32.44 लाख टन राशन का वितरण किया गया, जो कुल आवंटन की तुलना में 82 फीसदी है.

धांधलियों की कमी नहीं

अब जरा उन जगहों के हाल जान लेते हैं जहां वाकई राशन पहुंचना था. उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से पन्ना लाल ने गरीब परिवारों से राशन के बारे में पूछा तो वे खामोश हो गए. कहते हैं कि कौन सा राशन, किस काम का ऐसा राशन जो परिवार का पेट ना भर सके? देवरीबारी गांव की कमली देवी कहती हैं परिवार में 5 लोग हैं पर राशन 4 लोगों लायक मिलता है. उसमें भी कई बार तौल में कम सामान ही देते हैं. सामान ज्यादा मांगे तो दुकानदार धमकाते हैं. कहते हैं जो मिल रहा है वो ले लो नहीं तो ये भी बंद कर देंगे. कमली कहती हैं कि घर में तीन बच्चे हैं तो अब क्या एक बच्चे को भूखा रखें? क्योंकि उसके नाम का राशन सरकार दे नहीं रही?

हकीकत यही है. सरकार ने 4 लोगों के परिवार को आइडल मान कर योजना घोषित कर दी. पर परिवार के उन सदस्यों का क्या जो पांचवे नम्बर या उसके बाद आते हैं? गिद्धौर से संजीवन कुमार सिंह कहते हैं कि उनके यहां तो हालात और भी खराब हैं. डीलर साफ तौर पर राशन देने से मना कर रहे हैं. मौरा पंचायत के अंत्योदय कार्डधारियों में से एक उषा देवी कहती हैं कि  गांव में राशन का डीलर है जीवलाल यादव, उसके पास राशन लेने गए थे.. पर उसने हमें भगा दिया. पिछले महिने तक राशन दिया था पर इस महीने से मना कर दिया. कहता है कि तुम लोगों का नाम सूची में नहीं है. उनसे कहा तुम्हारे मम्मी पापा को मिलेगा राशन अब, तुम लोगों को नहीं. उषा कहती हैं कि मेरे मां बाप और पति लॉकडाउन के कारण दिल्ली में फंसे है, उन्हें भी वहां खाने को नहीं मिल रहा है. हमारे पास तो भूख से मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. 

जीविका से भी नहीं मिल रही मदद

अप्रैल में बिहार सरकार ने कहा था कि जीविका कर्मचारी जरूरतमंद लाभार्थियों की पहचान कर उनका राशन कार्ड अपडेट करने या नया बनाने में मदद करेंगी. जीविका कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी कामों को लागू करने वालीं महिलाओं के समूह हैं. 4 मई को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्य सचिव दीपक कुमार को ऐसे गरीब परिवारों के राशन कार्ड बनाने को कहा था जिनके पास कार्ड नहीं हैं लेकिन जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिखता.

मुजफ्फरपुर की कुछ ग्रामीण महिलाएं बताती हैं कि जीविका दीदी को राशन कार्ड बनाने के लिए सब कागज दे दिए थे पर अब तक कार्ड नहीं बन पाया. डीलर कहता है कि कोई सबूत लाओ, तो हमने आधार कार्ड दिखाया पर उसने राशन नहीं दिया. बोलता है मुखिया से लिखवाकर लाओ. मुखिया जी लिखकर देने को तैयार नहीं है, अब ऐसे में क्या करें? 

मधुबनी जिले के करमौली पंचायत के मुखिया बताते हैं कि जीविका के तहत राशन कार्ड बन रहे हैं पर वहां भी पैसे मांगे जा रहे हैं जबकि सरकार तो ये काफ फ्री में करवाने की बात कर रही है. गांव के ही लोग हमसे शिकायत कर रहे हैं कि जीविका वाले उनसे राशन कार्ड के बदले पैसे मांग रहे हैं. अब जिनको कार्ड चाहिए उनको पैसा देने में दिक्कत नहीं पर जिनके पास पैसे ही नहीं वो क्या करें? मुजफ्फरपुर के आसपास की पंचायतों के मुखिया बताते हैं कि जिन लोगों के पास राशन कार्ड नहीं था उन लोगों को राशन नहीं मिल रहा है. डीलरों से बात करके किसी तरह कुछ व्यवस्था करवा दे रहे हैं पर सरकार की तरफ से उन्हें कोई मदद नहीं मिल रही. 

राशन कार्ड है पर राशन नहीं

जमुई के हरनी गांव की रहने वाली विधवा रेखा देवी बताती हैं कि घर में कोई कमाने वाला नहीं है. हमारा नया राशन कार्ड बना है पर डीलर कहते हैं कि नए कार्ड पर राशन नहीं दिया जाएगा. हमने कहा कि सरकार तो बोल रही है कि सबको राशन मिलेगा तो बोलता है कि सरकार के कहने से क्या होता है? हमें तो अभी ऐसा कुछ नहीं कहा. रेखा देवी पर 5 बच्चों की जिम्मेदरी है. गांव में मनरेगा के तहत एक बार ​काम मिला था बस उसके बाद वे दूसरों की दया पर अपने बच्चे पाल रही हैं. कहीं से कोई आकर दान दे देता है तो बच्चों को खाना खिला देती हैं. वैसे रेखा अकेली नहीं है, हरनी जैसे और भी गांव हैं जहां कई महिलाएं अकेली हैं और उनके सामने बच्चों को पेटभर भोजन कराने का संकट है.

हरनी गांव की ही काजल देवी कहती हैं कि राशन कार्ड बना हुआ है पर डीलर राशन देने से मना कर रहा है. वजह वही है कि राशन कार्ड नया है और उस पर कुछ मिलेगा नही. डीलर बोलते हैं कि इस कार्ड पर अगले साल जनवरी से राशन देंगे. काजल पूछती हैं कि अब तब तक बच्चों को क्या खिलाएं? खुद क्या खाएं? सरकार तो ऐसा कुछ बोली नहीं है..

मध्यप्रदेश में भी सरकार ने सभी गरीबों को राशन देने की घोषणा की है, चाहे उसके पास राशन कार्ड हो या नहीं. लेकिन यहां भी राशन वितरण की अनियमितताओं की कई शिकायतें हैं. भोजन के अधिकार अभियान से जुड़े सचिन जैन बताते हैं कि रीवा जिले में बौसड़ स्थित राशन दुकान के सेल्समैन ने गांव-गांव जाकर राशनकार्डधारी लोगों के बायोमेट्रिक ले लिया और कहा कि कोरोना के कारण लॉकडाउन में तीन महीने का राशन मिलना है, इसलिए वह रिकॉर्ड के लिए ग्रामीणों से पहले ही बायोमेट्रिक पहचान ले रहा है. दो दिन बाद से वह कहने लगा कि राशन ही नहीं आया है. बाद में पता चला कि वहां राशन गया था, लेकिन वितरण नहीं किया गया और 352 परिवारों के तीन महीने का लगभग 200 क्विंटल राशन बेच दिया गया है. अब इस मामले में जांच बैठा दी गई है.

तैयार हो रहे भ्रष्टाचार के नए आयाम

सोचिए जब एक राशन दुकान से इस तरह का मामला निकलता है, तो पूरे प्रदेश में कई जगह ऐसी घटनाएं घटी होंगी. प्रदेश में 8 लाख परिवारों के राशन कार्ड बनने के आवेदन लंबित है. यानी 32 लाख लोगों तक बिना राशन कार्ड के राशन पहुंचाने की जिम्मेदारी सरकार ने ली है, जिनके नाम उसके पास है. इसके अलावा लाखों प्रवासी मजदूर एवं अन्य गरीब हैं, जिन तक राशन पहुंचाना है. वितरण प्रणाली को सुदृढ़ नहीं कर पाने का परिणाम है कि गरीबों का निवाला भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है. वैसे मध्यप्रदेश के लिहाज में राशन की घपलेबाजी कोई नई नहीं है. 5 दिसंबर 2017 को भी भोपाल में राशन का एक बड़ा घोटाला सामने आया था. भोपाल के करोंद मंडी में 1562 बोरियों में 781 क्विंटल गेहूं और 144 क्विंटल चावल जब्त किया गया था. यह राशन भोपाल में शारीरिक रूप से विकलांग, आश्रय घरों और मदरसों के लिए आवंटित किया गया था. इसे खुले बाजार में बेचने के लिए व्यापारियों और ट्रांसपोर्टर ने नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों और मदरसा के प्रबंधन के साथ मिलकर साजिश रची थी. जुलाई 2016 में भोपाल में भारी बारिश से निचली बस्तियों में बाढ़ आने के कारण पीड़ितों को वितरित किए गए गेहूं में मिट्टी मिली हुई थी. रिपोर्ट में पता चला कि 50-50 किलो गेहूं के बोरे में 12 किलो तक मिट्टी मिलाई गई थी. 50 किलो की बोरियों का वजन भी कम पाया गया था. इस तरह से उनमें लगभग 27 फीसदी मिट्टी पाई गई थी.

जुलाई में अलायंस फॉर दलित राइट्स ने बिहार के 14 जिलों के 1400 दलित और आदिवासी परिवारों का सर्वेक्षण किया था ताकि पता लगाया जा सके कि लॉकडाउन का इन परिवारों की आर्थिक क्षमता पर क्या असर पड़ा है. उनकी रिपोर्ट से पता चलता है कि ग्रामीण बिहार में इन समुदायों को खाद्यान्न की कमी हो रही है. रिपोर्ट में लिखा है, “इन लोगों की बड़ी संख्या को उन कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला है जिनसे जारी संकट से पार पाने में इन्हें मदद मिल सकती थी.” उस रिपोर्ट में आगे लिखा है कि सर्वे किए गए परिवारों में से केवल दो फीसदी ऐसे परिवार थे जो लॉकडाउन की घोषणा के दिन खाद्य दृष्टि से सुरक्षित थे और जिनके पास एक साल का अनाज उपलब्ध था. 49.4 फीसदी के पास केवल कुछ दिनों का अनाज और 14.5 फीसदी लोगों के पास बिल्कुल अनाज नहीं था.

यानि अरबों के पैकेज की घोषणा करने के बाद भी गरीब की थाली में कुछ नहीं पहुंच रहा है. नेता—मंत्री अब राजनीती में व्यस्त हैं और मुख्यधारा का मीडिया उनकी चाटुकारिता में. बाकी बची बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के दलितों की एक बड़ी आबादी आर्थिक तनाव, कठिनाई, भूख और भुखमरी का सामना कर रही है.